Tuesday, 29 September 2015

खुद को अकेला क्यूँ समझे तू राम जो खेवनहारा हैं

खुद को अकेला क्यूँ समझे तू
राम जो खेवनहारा हैं
भूल जा इस बेरंग जहाँ को
राम का नाम सहारा हैं

सब बल, बुद्धि, धन के पुजारी
स्वार्थ ने सबको मारा हैं
तू चाहता हैं कोरी चाहत
राम ही ऐसा प्यारा हैं

सुन्दरता की हवस सभी को
नश्वर देह हमारा हैं
जग की प्यास नहीं बुझती हैं
राम तो अमृतधारा हैं

जग की होड से बाहर आजा
पलभर अपना तू हो जा
मंद मंद मुसकाये अन्दर
तेरा सिर्फ राम राजा
राम हैं अन्दर, राम हैं बाहर
जीवन मेरा संवारा रे
राम के नाम पे मर मिट जाऊं
सार्थक जीवन मेरा रे 
जय श्री सीताराम

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