Monday, 1 April 2013

प्रभु की शोभा है कैसी निराली मेरे मन को लुभाए हुए है ।

प्रभु की शोभा है कैसी निराली
मेरे मन को लुभाए हुए है ।
नयन, पग, कर, बदन जैसे नीला कमल
ओंठ बिम्बा फल को लजाये हुए है ।।
कर में धनु-वाण कांधे है तरकश बंधा
श्यामसूरति घटा मेघ छाये हुए है ।
कान-कुंडल, है माथे पे सुंदर तिलक
लम्बी-लम्बी भुजा मन को भाए हुए है ।।
सिर पे मणि का मुकुट उर में दिज पद चिन्ह
सुंदर नीलाम्बर मन को चुराए हुए है ।
मंगलमूरति है इतनी सुहानी
शिवजी उर में बसाये हुए हैं ।।
सारद सेष भी पार पाते नही
राम सम राम ही सब गाये हुए हैं ।
संतोष शोभा बहुत मति मेरी है कम
कोटि मदनों के मद को नसाए हुए है ।

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