Monday, 1 April 2013

राजीवनयन धरे धनु सायक । भगत विपति भंजन सुखदायक ।।

राजीवनयन धरे धनु सायक । भगत विपति भंजन सुखदायक ।।
जो माया सब जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहुँ न पावा ।।
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ।।
सोइ सच्चिदानंद घन रामा । अज बिग्यान रूप बल धामा ।।
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ।।
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता ।।
निर्मम निराकार निरमोहा । नित्य निरंजन सुख संदोहा ।।
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ।।
इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रवि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ।।
राम सच्चिदानंद दिनेसा । नहिं तँह मोह निसा लवलेसा ।।
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ज्ञान गुन धामू । ।
जासु अंस उपजहिं गुनखानी । अगनित लच्छि उमा ब्रम्हानी ।।
भृकुटि बिलास जासु जग होई । राम बाम दिसि सीता सोई ।। 
जगदात्मा महेश पुरारी । जगत जनक सबके हितकारी ।।
शंकरु जगतवंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ।।
बिनु छल विश्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू ।।
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना । जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ।।
बंदउँ लछिमन पद जलजाता । सीतल सुभग भगत सुखदाता ।। 
रिपुसूदन पद कमल नमामी । सूर सुसील भरत अनुगामी ।।
महावीर विनवउँ हनुमाना । राम जासु जस आप बखाना ।। 
पवन तनय बल पवन समाना । वुद्धि विवेक विज्ञान निधाना ।।
हनूमान सम नहिं बड़भागी । नहिं कोउ रामचरन अनुरागी ।।
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार-बार प्रभु निज मुख गाई ।। 

-गोस्वामीतुलसीदासजी (श्रीरामचरितमानस से ) ।

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