Wednesday, 3 April 2013

गणपति की सेवा मंगल मेवा सेवा से सब विघ्न टरै ।।

गणपति की सेवा मंगल मेवा
सेवा से सब विघ्न टरै ।।

तीन लोक के सकल देवता
द्वार खड़े नित अर्ज करैं ।।

रिधि सिधि दक्षिण वाम विराजैं
अरु आनन्द सों चवर करैं ।।

धूप दीप और लिए आरती
भक्त खड़े जयकार करैं ।।

गुड़ के मोदक भोग लगत हैं
मूषक वाहन चढ्यो करै ।।

सौम्यरूप से ये गणपति को
विघ्न भाग ज्या दूर परैं ।।

लियो जन्म गणपति प्रभुजी सुन
दुर्गा मन आनन्द भरैं ।।

अद्भुत बाजा बज्या इन्द्रका
देव वधू जहँ गान करैं ।।

श्री शंकर के आनन्द उपज्यो
नाम सुन्या सब विघ्न टरैं ।।

आनि विधाता बैठे आसन
इन्द्र अप्सरा नृत्य करैं ।।

देखि वेद ब्रह्माजी जाको
विघ्न विनाशक नाम धरैं ।।

एक दन्त गजवदन विनायक
त्रिनयन रूप अनूप धरैं ।।

पग थंभा सा उदर पुष्ट है
देख चन्द्रमा हास्य करै ।।

दै शराप श्रीचन्द्र देव को
कला हीन तात्काल करैं ।।

चौदह लोक में फिरैं गणपती
तीन भुवन में राज करैं ।।

उठि प्रभात जप करै ध्यान
कोइ ताके कारज सर्व सरैं ।।

पूजा काल आरती गावै
ताके सिर यश छत्र फिरैं ।।

गणपति की पूजा पहले करनी
काम सभी निर्विघ्न सरैं ।।

श्रीप्रताप श्री गणपति जी की
हाथ जोड़कर स्तुति करैं ।।

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