Tuesday, 23 April 2013

श्रीराम चालीसा



श्रीराम चालीसा 

।। श्री गणेशायनमः ।।

।। राम श्रीराम श्रीराम श्रीराम ।।

दोहा- 
तुलसिदास मानस विमल राम नाम श्रीराम ।
चहु गुर पद रज शीस धरि सादर करौं प्रनाम ।।
अविगत अलख अनादि प्रभु जगताश्रय जगरूप ।
पद कंज रति देहु मोहि अविरल अमल अनूप ।।

चौपाई-
जय रघुनाथ राम जग नायक । दीनबन्धु सज्जन सुखदायक ।।
प्रनतपाल सुंदर सब लायक । असरन सरन धरे धनु सायक ।।
नाम लेत मुद मंगल दायक । सरल सबल असहाय सहायक ।।
सुमुख सुलोचन अज अविनासी । संतत गिरिजा पति उर वासी ।।
अगम अगोचर जन दुःख नासी । सहज सुगम अनुपम सुखरासी ।।
दया क्षमा करुना गुन सागर । पुरुष पुरान सुशील उजागर ।।
हरि हर बिधि सुर नर मुनि भावन । अघ अविवेक समूल नसावन ।।
भरत लखन रिपुहन हनुमाना । संग सिया राजत भगवाना ।।
रूप अनूप मदन मद हारी । गावत गुन सुर नर मुनि झारी ।।
सुर नर मुनि प्रभु देखि दुखारे । तजि निज धाम धरा पगु धारे ।
सुत बिनु दशरथ राय दुखारी । सुत होइ तिनको कियो सुखारी ।।
मख हित मुनिवर अति दुःख पाए । दुष्टन दलि तुम यज्ञ कराए ।
पाहन बनि मुनि गौतम नारी । सहत विपिन नाना दुःख भारी ।
ससंकोच निज पद रज डारी । दयासिन्धु तुम कियो सुखारी ।।
सोच मगन नृप सिया सहेली । मातु सकल नर नारि नवेली ।।
सबकर सोच मिटायेउ स्वामी । भंजि चाप जय राम नमामी ।।
परशुराम बहु आँखि दिखाए । गुन गन कहि धनु देय सिधाये ।।
करि कुचाल जननी पछितानी । तिनको बहुत भांति सनमानी ।
केवट नीच ताहि उर भेटा । सुर दुर्लभ सुख दे दुःख मेटा ।।
भरत भाय अति कियो बिषादा । जगत पूज भे राम प्रसादा ।।
आप गरीब अनेक निवाजे । साधु सभा ते आय बिराजे ।।
बन बन जाय साधु सनमाने । तिनके गुन गन आप बखाने ।।
नीच जयंत मोह बस आवा । जानि प्रभाव बहुत पछितावा ।।
शवरी गीध दुर्लभ गति पाए । सो गति लखि मुनिराज लजाये ।। 
कपि असहाय बहुत दुःख मानी । बसत खोह तजि के रजधानी ।।
करि कपीस तेहिं निज पन पाला । जयति जयति जय दीनदयाला ।।
बानर भालू मीत बनाये । बहु उजरे प्रभु आप बसाये ।।
कोल किरात आदि बनवासी । बानर भालु यती सन्यासी ।।
सबको प्रभु कियो एक समाना । को नहि नीच रहा जग जाना ।।
दे मुंदरी हनुमन्त पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाए ।
पवनतनय गुन श्रीमुख गाये । जग बाढ़े प्रभु आप बढ़ाए ।।
हनुमत को प्रभु दियेउ बड़ाई । संकट मोचन नाम धराई ।
रावण भ्रात निसाचर जाती । आवा मिलइ गुनत बहु भांती ।।
ताहि राखि बहु बिधि हित कीन्हा । लंका अचल राज तुम दीन्हा ।।
चार पुरुषारथ मान बड़ाई । देत सदा दासन्ह सुखदाई ।।
मो सम दीन नहीं हित स्वामी । मामवलोकय अन्तरयामी ।।
रीति प्रीति युग-युग चलि आई । दीनन को प्रभु मान बड़ाई ।।
देत सदा तुम गहि भुज राखत । साधु सभा तिनके गुन भाखत ।।
कृपा अनूग्रह कीजे नाथा । विनवत दास धरनि धरि माथा ।।
छमि अवगुन अतिसय कुटिलाई । राखो सरन सरन सुखदाई ।।

दोहा- 
राम राम संतोष कह भरि नयनन महु नीर ।
प्रनतपाल असरन सरन सरन देहु रघुवीर ।।
राम चलीसा नेम ते पढ़ जो प्रेम समेंत ।
बसहिं आइ सियाराम जु ताके हृदय निकेत ।।

।। सियावर रामचन्द्र की जय ।।

No comments:

Post a Comment