Saturday, 30 March 2013

***संकट मोचन हनुमान् स्तोत्रम्***

***संकट मोचन हनुमान् स्तोत्रम्***

काहे विलम्ब करो अंजनी-सुत ।
संकट बेगि में होहु सहाई ।।

नहिं जप जोग न ध्यान करो ।
तुम्हरे पद पंकज में सिर नाई ।।

खेलत खात अचेत फिरौं ।
ममता-मद-लोभ रहे तन छाई ।।

हेरत पन्थ रहो निसि वासर ।
कारण कौन विलम्बु लगाई ।।

काहे विलम्ब करो अंजनी सुत ।
संकट बेगि में होहु सहाई ।।

जो अब आरत होई पुकारत ।
राखि लेहु यम फांस बचाई ।।

रावण गर्वहने दश मस्तक ।
घेरि लंगूर की कोट बनाई ।।

निशिचर मारि विध्वंस कियो ।
घृत लाइ लंगूर ने लंक जराई ।।

जाइ पाताल हने अहिरावण ।
देविहिं टारि पाताल पठाई ।।

वै भुज काह भये हनुमन्त ।
लियो जिहि ते सब संत बचाई ।।

औगुन मोर क्षमा करु साहेब ।
जानिपरी भुज की प्रभुताई ।।

भवन आधार बिना घृत दीपक ।
टूटी पर यम त्रास दिखाई ।।

काहि पुकार करो यही औसर ।
भूलि गई जिय की चतुराई ।।

गाढ़ परे सुख देत तु हीं प्रभु ।
रोषित देखि के जात डेराई ।।

छाड़े हैं माता पिता परिवार ।
पराई गही शरणागत आई ।।

जन्म अकारथ जात चले ।
अनुमान बिना नहीं कोउ सहाई ।।

मझधारहिं मम बेड़ी अड़ी ।
भवसागर पार लगाओ गोसाईं ।।

पूज कोऊ कृत काशी गयो ।
मह कोऊ रहे सुर ध्यान लगाई ।।

जानत शेष महेष गणेश ।
सुदेश सदा तुम्हरे गुण गाई ।।

और अवलम्ब न आस छुटै ।
सब त्रास छुटे हरि भक्ति दृढाई ।।

संतन के दुःख देखि सहैं नहिं ।
जान परि बड़ी वार लगाई ।।

एक अचम्भी लखो हिय में ।
कछु कौतुक देखि रहो नहिं जाई ।।

कहुं ताल मृदंग बजावत गावत ।
जात महा दुःख बेगि नसाई ।।

मूरति एक अनूप सुहावन ।
का वरणों वह सुन्दरताई ।।

कुंचित केश कपोल विराजत ।
कौन कली विच भऔंर लुभाई ।।

गरजै घनघोर घमण्ड घटा ।
बरसै जल अमृत देखि सुहाई ।।

केतिक क्रूर बसे नभ सूरज ।
सूरसती रहे ध्यान लगाई ।।

भूपन भौन विचित्र सोहावन ।
गैर बिना वर बेनु बजाई ।।

किंकिन शब्द सुनै जग मोहित ।
हीरा जड़े बहु झालर लाई ।।

संतन के दुःख देखि सको नहिं ।
जान परि बड़ी बार लगाई ।।

संत समाज सबै जपते सुर ।
लोक चले प्रभु के गुण गाई ।।

केतिक क्रूर बसे जग में ।
भगवन्त बिना नहिं कोऊ सहाई ।।

नहिं कछु वेद पढ़ो, नहीं ध्यान धरो ।
बनमाहिं इकन्तहि जाई ।।

केवल कृष्ण भज्यो अभिअंतर ।
धन्य गुरु जिन पन्थ दिखाई ।।

स्वारथ जन्म भये तिनके ।
जिन्ह को हनुमन्त लियो अपनाई ।।

का वरणों करनी तरनी जल ।
मध्य पड़ी धरि पाल लगाई ।।

जाहि जपै भव फन्द कटैं ।
अब पन्थ सोई तुम देहु दिखाई ।।

हेरि हिये मन में गुनिये मन ।
जात चले अनुमान बड़ाई ।।

यह जीवन जन्म है थोड़े दिना ।
मोहिं का करि है यम त्रास दिखाई ।।

काहि कहै कोऊ व्यवहार करै ।
छल-छिद्र में जन्म गवाईं ।।

रे मन चोर तू सत्य कहा अब ।
का करि हैं यम त्रास दिखाई ।।

जीव दया करु साधु की संगत ।
लेहि अमर पद लोक बड़ाई ।।

रहा न औसर जात चले ।
भजिले भगवन्त धनुर्धर राई ।।

काहे विलम्ब करो अंजनी-सुत ।
संकट बेगि में होहु सहाई ।।

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