Tuesday, 18 May 2010

जोगु न खिंधा जोगु न डंडे जोग न भसम चढाइहे।

जोगु न खिंधा जोगु न डंडे जोग न भसम चढाइहे।

जोग न मुंदी मूंडी मुडाइये जोगु न सिंघी वाईए।।
अंजन माहि निरंजनि रहीये जोगु जुगति इव पाईये।
गली जोगु न होई।
एक दृसटि करि समसरि जाणे जोगी कहिये सोई।।






योग भगवा धारण करने में, हाथ में डंडा ले लेने में, शरीर पर भस्म रमा लेने में, कानो में कुण्डल पहन लेने में, श्रृंगी बजाने में, सर मुंडवाने में या भस्म पोत लेने में नहीं है। वास्तविक योग संसार में रहते हुए भी सांसारिक बुराईयों से दूर रहने में है। वास्तविक योगी वह है जो सभी को समान दृष्टि से देखता हो।

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